राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
National Commission for Scheduled Castes
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संवैधानिक सुरक्षण

अनुसूचित जातियों के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक रक्षोपाय उपाय नीचे उल्लिखित हैं:-

1. विकास और सुरक्षात्मक रक्षोपाय

ये रक्षोपाय संविधान के राज्य नीति निर्देशक सिद्धांतों और अनुच्छेद 46 में एक विशिष्ट प्रावधान में निहित हैं, जो विकासात्मक और विनियामक दोनों पहलुओं को शामिल करते हुए एक व्यापक प्रावधान है। यह इस प्रकार है:-

अनुच्छेद 46 राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा।”

अनुच्छेद 25(2)() में प्रावधान है कि सार्वजनिक प्रकार की हिंदुओं की धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिए खोल दिया जाएगा। यह प्रावधान इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि हिंदुओं के कुछ संप्रदाय दावा करते थे कि केवल संबंधित संप्रदाय के सदस्यों को ही उनके मंदिरों में प्रवेश का अधिकार है। यह केवल अनुसूचित जाति के लोगों को ऐसे मंदिरों में प्रवेश से रोकने के लिए एक बहाना था। इस प्रावधान के उद्देश्य के लिए हिंदू शब्द में सिख, जैन और बौद्ध शामिल हैं।


2. सामाजिक सुरक्षा

अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। ‘अस्पृश्यता’ से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा। इस अनुच्छेद को प्रभावी बनाने के लिए, संसद ने कई अधिनियम बनाए जैसे, अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955। इस अधिनियम के प्रावधानों को और अधिक कठोर बनाने के लिए, अधिनियम को 1976 में संशोधित किया गया और इसका नाम बदलकर सिविल अधिकार संरक्षण (पीसीआर) अधिनियम, 1955 कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों को अधिनियम के प्रावधानों के तहत सिविल अधिकार संरक्षण नियम, 1977 कहा जाता है। संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 भी पारित किया, जो 30.01.1990 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियम जिन्हें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 1995 कहा जाता है, 31.03.1995 को अधिसूचित किए गए थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015 को 01.01.2015 को अधिसूचित किया गया था और संशोधित अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 2016 दिनांक 14.04.2016 को लागू हुए।

अनुच्छेद 23 मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलातश्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है तथा यह प्रावधान करता है कि इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा। इसमें अनुसूचित जातियों का विशेष उल्लेख नहीं है, लेकिन चूंकि अधिकांश बंधुआ मजदूर अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं, इसलिए इस अनुच्छेद का इन समुदायों के लिए विशेष महत्व है। इस अनुच्छेद के अनुसरण में, संसद ने बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 पारित किया है। इस अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, श्रम मंत्रालय बंधुआ मजदूरों की पहचान, मुक्ति और पुनर्वास के लिए एक केंद्र प्रायोजित स्कीम चला रहा है।

अनुच्छेद 24 में प्रावधान है कि 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा। बाल श्रम को रोकने के लिए केंद्र और राज्य कानून हैं । यह अनुच्छेद अनुसूचित जातियों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परिसंकटमय कार्यों में लगे बाल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा इन समूहों से संबंधित है।


3. आर्थिक रक्षोपाय

उपर्युक्त अनुच्छेद 23, 24 और 46 के प्रावधान भी अनुसूचित जातियों के लिए आर्थिक रक्षोपाय का हिस्सा हैं।


4. शैक्षिक और सांस्कृतिक रक्षोपाय

अनुच्छेद 15(4) राज्य को नागरिकों के किसी भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है। यह प्रावधान संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था, जिसने कई अनुच्छेदों में संशोधन किया था। इस प्रावधान ने राज्य को तकनीकी, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों सहित शैक्षणिक संस्थानों और वैज्ञानिक और विशिष्ट पाठ्यक्रमों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करने में सक्षम बनाया है। इस अनुच्छेद के साथ-साथ अनुच्छेद 16(4) में 'पिछड़ा वर्ग' शब्द का प्रयोग एक सामान्य शब्द के रूप में किया गया है और इसमें पिछड़े वर्गों की विभिन्न श्रेणियां जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय (विमुक्त जातियां) और खानाबदोश/अर्ध खानाबदोश समुदाय शामिल हैं।


5. राजनीतिक रक्षोपाय

अनुच्छेद 164() में प्रावधान है कि बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा, जो साथ ही अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण का या किसी अन्य कार्य का भी भारसाधक हो सकेगा।

अनुच्छेद 330 लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 332 राज्य विधानसभा में अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है (विधान सभाएं) ।

अनुच्छेद 371 , , और में क्रमशः नागालैंड, असम, मणिपुर और सिक्किम के संबंध में विशेष प्रावधान हैं।


6. सेवा रक्षोपाय

अनुच्छेद 16(4) – राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने का अधिकार देता है।  

अनुच्छेद 16(4क) – में निर्दिष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर, ‘पारिणामिक ज्येष्ठता सहित’, प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी’।

अनुच्छेद 16(4ख) – में निर्दिष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को किसी वर्ष में किन्हीं न भरी गई ऐसी रिक्तियों को, जो खंड (4) या खंड (4क) के अधीन किए गए आरक्षण के लिए किसी उपबंध के अनुसार उस वर्ष में भरी जाने के लिए आरक्षित हैं, किसी उत्तरवर्ती वर्ष या वर्षों में भरे जाने के लिए पृथक् वर्ग की रिक्तियों के रूप में विचार करने से निवारित नहीं करेगी और ऐसे वर्ग की रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ जिसमें वे भरी जा रही हैं, उस वर्ष की रिक्तियों की कुल संख्या के संबंध में पचास प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा का अवधारण करने के लिए विचार नहीं किया जाएगा’।

अनुच्छेद 320(4) में यह प्रावधान है कि खंड (3) की किसी बात से यह अपेक्षा नहीं होगी कि लोक सेवा आयोग से उस रीति के संबंध में, जिससे अनुच्छेद 16(4क) में निर्दिष्ट कोई उपबंध किया जाना है या उस रीति, जिससे अनुच्छेद 335 के उपबंधों को प्रभावी किया जाना है, परामर्श किया जाए।

अनुच्छेद 335 में उल्लिखित है कि संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियां करने में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों का प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार ध्यान रखा जाएगा’। ‘परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के पक्ष में, संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं के किसी वर्ग या वर्गों में या पदों पर प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए, किसी परीक्षा में अर्हक अंकों में छूट देने या मूल्यांकन के     मानकों को घटाने के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी’ (संविधान का 82वां संशोधन, अधिनियम, 2000)।

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